पिता को गले लगाते ही छलक पड़े बेटियों के आंसू; भावुक हुआ पूरा सभागार ‘न समझे गए माता-पिता’ व्याख्यान में प्रो. वसंत हंकारे ने जगाई माता-पिता के त्याग की भावना; पालकमंत्री गुलाबराव पाटील ने किया ‘मोबाइल की गुलामी से बाहर निकलने’ का आह्वान जलगांव, प्रतिनिधि : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मोबाइल, नशे की लत और क्षणिक सुखों के पीछे भागते हुए माता-पिता के साथ संवाद और अपनापन कम होता जा रहा है। ऐसे समय में माता-पिता के महत्व, उनके त्याग और बच्चों की उनके प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने वाला ‘न समझे गए माता-पिता’ भावनात्मक एवं प्रबोधनात्मक कार्यक्रम जलगांव में बेहद भावुक वातावरण में संपन्न हुआ। प्रेस फोटोग्राफर फाउंडेशन की ओर से रविवार, 6 सितंबर को मु. जे. महाविद्यालय के कवि कालिदास सभागार में इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। प्रसिद्ध वक्ता प्रो. वसंत हंकारे ने अपने भावनात्मक और प्रभावशाली संवाद के माध्यम से उपस्थित छात्र-छात्राओं को माता-पिता के त्याग का एहसास कराया। पिता को गले लगाते ही भावुक हुई बेटियां व्याख्यान के दौरान प्रो. हंकारे ने उपस्थित पिताओं को मंच पर बुलाया और बेटियों से अपने पिता के पास जाकर उनसे संवाद करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा, ‘अपने पिता को समझिए, उनके करीब जाइए और एक बार उन्हें गले लगाकर देखिए।’ प्रो. हंकारे के इस आह्वान के बाद कई बेटियां अपने पिता के पास पहुंचीं और उन्हें गले लगा लिया। इस भावुक दृश्य को देखकर सभागार का माहौल भी भावनाओं से भर गया। कई बेटियों की आंखों से आंसू छलक पड़े, वहीं पिताओं ने भी अपनी बेटियों को गले लगाकर भावनाओं को व्यक्त किया। कुछ क्षणों के लिए पूरे सभागार में भावुक शांति छा गई। ‘माता-पिता के जीवित रहते उनकी कदर करें’ प्रो. वसंत हंकारे ने कहा कि माता-पिता जब तक हमारे साथ हैं, तब तक उनकी कदर करें और उनकी आंखों में आंसू न आने दें। उनके चले जाने के बाद उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाने का कोई अर्थ नहीं है। मां नौ महीने तक पीड़ा सहकर बच्चे को जन्म देती है, जबकि पिता पूरी जिंदगी मेहनत कर परिवार का सहारा बनता है। इसलिए बच्चों को उनके त्याग का हमेशा एहसास रखना चाहिए। उन्होंने युवा पीढ़ी से मोबाइल और क्षणिक सुखों के मोह से बाहर निकलकर छत्रपति शिवाजी महाराज, महात्मा फुले, माता रमाई, राजमाता जीजाऊ और अहिल्यादेवी होलकर जैसे महान व्यक्तित्वों के विचारों को आदर्श बनाने का आह्वान किया। उन्होंने मां के संघर्ष और त्याग को समझते हुए उसका सम्मान करने तथा पिता के परिश्रम और त्याग का मूल्य पहचानने की अपील की। ‘मोबाइल की गुलामी से बाहर निकलें’ – पालकमंत्री गुलाबराव पाटील पालकमंत्री गुलाबराव पाटील ने युवा पीढ़ी से मोबाइल की लत में डूबने के बजाय परिवार के लिए समय निकालने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बच्चों को माता-पिता के साथ संवाद बढ़ाना चाहिए और परिवार व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। ‘माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद खत्म होता जा रहा’ – विधायक सुरेश भोले विधायक सुरेश भोले ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद लगातार कम होता जा रहा है। इस संवाद को फिर से जीवंत करने की जरूरत है। पारिवारिक रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए ऐसे सामाजिक एवं प्रबोधनात्मक कार्यक्रमों का आयोजन आवश्यक है। भाषण तक सीमित नहीं रहा ‘माता-पिता को समझें’ का संदेश कार्यक्रम के माध्यम से ‘माता-पिता को समझें’ का संदेश बच्चों के मन में गहराई से पहुंचाया गया। यह कार्यक्रम केवल भाषण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बच्चों को प्रत्यक्ष रूप से अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान व्यक्त करने का अनुभव भी मिला। गणमान्य लोगों की उपस्थिति कार्यक्रम में पालकमंत्री गुलाबराव पाटील, विधायक सुरेश भोले, महापौर दीपमाला काले, जिलाधिकारी रोहन घुगे, जिला पुलिस अधीक्षक श्रीकांत धिवरे, मनपा आयुक्त आदित्य जीवने, आकाश भंगाले, विनय चांडक, जैन उद्योग समूह के मीडिया प्रमुख अनिल जोशी सहित विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्ति प्रमुख रूप से उपस्थित थे। इस अवसर पर फाउंडेशन के प्रभारी अध्यक्ष सचिन पाटील और सचिव अभिजीत पाटील भी मंच पर उपस्थित थे। फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष सुमीत देशमुख सहित फाउंडेशन के पदाधिकारी, पत्रकार, फोटोग्राफर, अभिभावक, विद्यार्थी और नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष सुमीत देशमुख ने किया, जबकि प्रस्तावना अभिजीत पाटील ने रखी। कार्यक्रम की सफलता के लिए प्रेस फोटोग्राफर फाउंडेशन के सदस्य हेमंत पाटील, प्रकाश लिंगायत, अरुण इंगले, भूषण पाटील, पांडुरंग महाले, भूषण हंसकर और रुपेश महाजन ने विशेष प्रयास किए। Post navigation श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह का 6 सितंबर से भव्य आयोजन पंडित मोहन व्यास करेंगे कथा का रसपान, कलश यात्रा से होगा शुभारंभ ‘ले लो हमारी जान… क्या जलगांवकरों की जान इतनी सस्ती है?’