जैन हिल्स में जल संरक्षण परियोजनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव; जल प्रबंधन का मिला पाठ ‘आओ, नदी को जानें’ अभियान के तहत महाराष्ट्र नदी संरक्षण कार्यशाला में मंथन; जनभागीदारी और टिकाऊ जल प्रबंधन पर जोर जलगांव, 12 अक्टूबर (प्रतिनिधि) : वर्षा जल का संचयन, जल भंडारण संरचनाओं का निर्माण और जल संरक्षण के व्यावहारिक कार्यों के माध्यम से जल प्रबंधन को समझने के उद्देश्य से ‘आओ, नदी को जानें’ अभियान के अंतर्गत आयोजित महाराष्ट्र नदी संरक्षण कार्यशाला के प्रतिभागियों ने सोमवार, 12 अक्टूबर को जैन हिल्स स्थित विभिन्न जल संरक्षण परियोजनाओं का दौरा किया। श्रद्धेय भवरलालजी जैन की संकल्पना से विकसित इन परियोजनाओं का निरीक्षण करते हुए प्रतिभागियों ने श्रद्धाधाम, भाऊंची सृष्टि तथा जैन इरिगेशन द्वारा मरम्मत किए गए जिला परिषद के तालाब सहित विभिन्न स्थानों पर किए गए कार्यों की जानकारी प्राप्त की। इस दौरान नदी संरक्षण, जनभागीदारी और टिकाऊ जल प्रबंधन के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया गया। वर्षा जल संचयन और जल भंडारण परियोजनाओं का निरीक्षण जैन इरिगेशन के संस्थापक श्रद्धेय भवरलालजी जैन की संकल्पना से साकार हुए जल संरक्षण कार्यों की जानकारी लेने का आह्वान कंपनी के सह-प्रबंध निदेशक अजित जैन ने उद्घाटन भाषण में किया था। इसी के अनुरूप कार्यशाला के दूसरे दिन के पहले सत्र में प्रतिभागियों ने श्रद्धाधाम का दौरा किया। यहां जैन हिल्स परिसर में होने वाली बारिश के पानी को एकत्रित कर बड़े पैमाने पर जल भंडारण करने के लिए विकसित व्यवस्था का निरीक्षण किया गया। इसके बाद भाऊंची सृष्टि के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित लगभग दो करोड़ लीटर क्षमता वाले जलाशय की जानकारी दी गई। प्रतिभागियों ने जिला परिषद के अधिकार क्षेत्र वाले उस तालाब का भी निरीक्षण किया, जिसकी मरम्मत जैन इरिगेशन ने की है। इस अवसर पर जैन इरिगेशन के सहयोगी पी. ए. पाटील तथा जनसंपर्क अधिकारी गिरीश कुलकर्णी ने विभिन्न परियोजनाओं की जानकारी दी। नदी संरक्षण के लिए जनभागीदारी जरूरी क्षेत्र भ्रमण के बाद आयोजित सत्र का प्रस्तावना भाषण अंकुश नारायणकर ने दिया। जल बिरादरी महाराष्ट्र के अध्यक्ष नरेंद्र चुघ की अध्यक्षता में आयोजित चर्चा सत्र में जयाजी पाईकराव, एच.पी. देशमुख, एकनाथ माळतकर, मनोहर हेपाट, सविता राजपूत और आरती पाटील ने भाग लिया। ‘सूखा सभी को पसंद है’ विषय के उदाहरण के माध्यम से नदी संरक्षण संबंधी कार्यों की जानकारी दी गई। मुरलीधर बेलखोडे ने सूक्ष्म जलग्रहण क्षेत्र के अनुसार नियोजन और नदियों के महत्व को स्पष्ट किया। उन्होंने स्कूलों, महाविद्यालयों तथा एमएसडब्ल्यू के विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। सविता राजपूत ने नदी संरक्षण के लिए जनआंदोलन के महत्व को रेखांकित किया, जबकि आरती पाटील ने नदियों, नालों, जलधाराओं, वृक्ष संरक्षण और कचरा प्रबंधन पर अपने विचार रखे। चर्चा के दौरान नदी संरक्षण की जिम्मेदारी, प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन, नदी के उद्गम से संगम तक समग्र नियोजन, कम से कम तीन स्थानों पर स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता तथा केटी वियर और बांधों के निर्माण में जैव विविधता का ध्यान रखने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। विजय चिमणकर ने ‘ग्रीन सर्जन’ की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए युवाओं को नदी संरक्षण कार्यों से जोड़ने और उन्हें ‘ग्रीन सर्जन’ के रूप में प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया। नदियों की स्थिति सुधारने के लिए जिला स्तर पर समितियां बनाने का सुझाव चर्चा सत्र की अध्यक्षता कर रहे नरेंद्र चुघ ने कहा कि नदियों की स्थिति चिंताजनक हो गई है। कुछ नदियां प्रदूषित पानी लेकर बह रही हैं, जबकि कुछ नदियों के अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है। इस स्थिति में बदलाव लाने के लिए जिला स्तर पर समितियां गठित कर नदी संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए। कार्यशाला के दूसरे और तीसरे सत्र में शिवाजी नाना पाटील, गोविंद जामदार, डॉ. हनुमंत साळुंखे, विलास साबळे, जयाजी पाईकराव, नरेंद्र चुघ, अभिजित शितोळे, चंद्रकांत उत्तेकर, गोकुळ सुरासे, ईश्वर पाटील, विजय चिमणकर, प्रकाश अर्जुनकर, सुनील रहाणे, विशाल सोमकुल, प्रमोद सरदार और चुन्नीलाल ब्राह्मणे ने अपने विचार रखे। इन सत्रों में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय, स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी तथा वैज्ञानिक पद्धति से जलस्रोतों के प्रबंधन की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया गया। 13 अक्टूबर को होगा कार्यशाला का समापन इस कार्यशाला का समापन 13 अक्टूबर को जलपुरुष राजेंद्र सिंह, जैन इरिगेशन के अध्यक्ष अशोक जैन तथा सह-प्रबंध निदेशक अजित जैन की उपस्थिति में होगा। राजस्थान के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में ग्रामीणों के साथ मिलकर जल संरक्षण का कार्य शुरू करने वाले राजेंद्र सिंह ने पारंपरिक ‘जोहड़’ यानी वर्षा जल संग्रह करने वाले छोटे मिट्टी के बांधों को पुनर्जीवित करने और हजारों जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समापन सत्र में प्रतिभागियों को उनके अनुभवों और मार्गदर्शन से जल संरक्षण के प्रभावी उपायों को समझने का अवसर मिलेगा। Post navigation मुक्ताईनगर से चोरी हुई टवेरा अमरावती में मिली! नवरात्रोत्सव और धार्मिक जुलूसों के चलते साप्ताहिक बाजार बंद रखने के आदेश